पटना के महावीर मंदिर का इतिहास सामाजिक विकास के केंद्र के रूप में बनाई पहचान

0
1272

पटना के महावीर मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा है। लेकिन, एक दौर वह भी था जब महावीर मंदिर न तो इतना प्रसिद्ध था, न भव्य। पटना जंक्शन के सामने एक विशाल पीपड़ का पेड़ हुआ करता था, जिसके पास ‘बिहार मिष्टान भंडार’ था। वहीं रेलवे की जमीन पर बजरंगबली की जोड़ा प्रतिमा स्थापित की गई और पूजा शुरू हो गई।
स्टेशन जाने के लिए उस समय रास्ता कच्चा था जिसपर बैलगाड़ी चला करती थी। इसी रास्ते से गुजरने वाली बैलगाड़ी से चंदे में एक-एक ईंट एकत्र कर महावीर मंदिर बनाया गया था। रामनवमी के दिन यहा श्रद्धालु ढोलक-झाल लेकर लोग चैता गाते थे।


लेकिन, मंदिर का अस्तित्‍व इसके बहुत पहले से है। बताया जाता है कि इसे 1730 में स्वामी बालानंद ने स्थापित किया था। साल 1900 तक यह मंदिर रामानंद संप्रदाय के अधीन था। इसपर 1948 तक इसपर गोसाईं संन्यासियों का कब्जा रहा। आगे 1948 में पटना हाइकोर्ट ने इसे सार्वजनिक मंदिर घोषित कर दिया। मंदिर का वर्तमान स्‍वरूप 1983 से 1985 के बीच आया। इसमें आचार्य किशोर कुणाल के प्रयास उल्‍लेखनीय हैं।
पटना के पुराने लोग बताते हैं कि पटना जंक्शन के सामने बजरंगबली की मूर्ति की पूजा करने मीठापुर निवासी झूलन पंडित आते थे। वर्तमान महावीर मंदिर के पीछे अंग्रेजों का मुस्लिम कैंटीन था। मंदिर के पास लोहे का गेट था जो शाम के बाद बंद हो जाता था, ताकि स्टेशन की ओर कोई न जा सके। उस समय रात में ट्रेन भी नहीं चलती थी।


मंदिर के सामने बांकीपुर जेल था जहां आज की बुद्ध स्मृति पार्क है। मंदिर से पूरब चिरैयाटांड कुम्हारटोली के पास चंदवा पोखर था, जहां आसपास के गांव गोरियाटोली, पृथ्वीपुर, लोहानीपुर के लोग स्नान करते थे। यहां स्नान करने के बाद कई लोग महावीर मंदिर में पूजा करने जाते थे।
1930 में खुली लड्डू की दुकान


1930 के आसपास मीठापुर के महादेव लाल ने महावीर मंदिर के पास बेसन के लड्डू की दुकान खोली थी। इसके पहले यहां पेड़े की दुकान थी। उस समय न तो फूल-माला की दुकानें होती थीं और न ही प्रसाद की। ज्यादातर महिलाएं घर में बने पकवान लाकर मंदिर में पूजा करती थीं।
मंदिर में गाते थे चैता
रामनवमी के अवसर पर लोग घरों में उपवास रखते थे। महिलाएं पूजा के लिए पकवान बनाती थीं। हर घर से महावीरी पताका लेकर लोग मंदिर जाते थे। वहां ध्वजा गाड़ते थे। अब सब कुछ बदल गया है। गांव के साथियों के साथ रामनवमी के दिन महावीर मंदिर में चैता गाया जाता था।


शोभायात्रा में शामिल होते थे नौजवान
रामनवमी के दिन शोभा यात्रा की परंपरा भी पुरानी है। इसमें बड़ी संख्या में नौजवान शामिल होते थे। आज की तरह तब साधन नहीं थे, लेकिन उत्साह में कोई कमी नहीं दिखती थी।
यहां रखा राम सेतु का पत्थर, हनुमान जी की युग्‍म मूर्तियां स्‍थापित
इस मंदिर का मुख्य द्वार उत्तर दिशा की ओर है और मंदिर के गर्भगृह में भगवान हनुमान की मूर्तियां हैं। मंदिर में सभी देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। यहां की एक खास बात यह है कि यहां रामसेतु का पत्थर कांच के बर्तन में रखा है। इसका वजन 15 किलो है और यह पानी में तैरता रहता है।


यह मंदिर अन्‍य हनुमान मंदिरों से अलग है, क्योंकि यहां बजरंगबली की युग्म मूर्तियां एक साथ हैं। एक मूर्ति परित्राणाय साधूनाम् अर्थात अच्छे लोगों के कारज पूर्ण करने वाली है और दूसरी मूर्ति- विनाशाय च दुष्कृताम्बु, अर्थात बुरे लोगों की बुराई दूर करने वाली है।

हनुमान चालीसा में वर्णित चौपाई है ‘नाशै रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा’। पटना जंक्शन के निकट स्थित हनुमान मंदिर इसको चरितार्थ करता दिखता है। यहां हनुमान वास्तव में संकट मोचक हैं तभी तो कैंसर से पीडि़त लोगों का कल्याण भी करते हैं। यह मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र ही नहीं बल्कि लाखोंं लोगों के उपकार का माध्यम भी है। मंदिर में चढऩे वाला नैवेद्यम् प्रसाद एवं दान पेटी से प्राप्त राशि से कैंसर पीडि़तों का इलाज होने के साथ ही कई सामाजिक कार्य भी हो रहे हैं।

करीब सौ साल पहले हनुमान की प्रतिमा कुछ भक्तों ने स्थापित की थी। तब शायद ही किसी ने यह कल्पना की होगी कि आने वाले समय में यह हजारों लोगों का भरण-पोषण कर कैंसर जैसी असाध्य बीमारियों के इलाज में भूमिका निभाएगी।

सामाजिक विकास के केंद्र के रूप में बनाई पहचान

महावीर मंदिर के सचिव एवं न्यास समिति के आचार्य किशोर कुणाल बताया कि साल 1983 में मंदिर ने आध्यात्मिक जागरण के साथ ही सामाजिक विकास के केंद्र के रूप में अपनी पहचान बनाई। मंदिर के कार्य को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए मार्च 1990 में एक नए न्यास का गठन हुआ।

नैवेद्यम् और चढ़ावे से होता है लोगों का कल्याण

आचार्य किशोर कुणाल ने बताया कि मंदिर में चढऩे वाले चढ़ावे एवं नैवेद्यम् प्रसाद से मिलने वाली राशि को परोपकार के कामों में लगाया जाता है। अक्टूबर 1987 को धार्मिक न्यास बोर्ड का पदभार संभालने के बाद वर्ष 1989 में कंकड़बाग में पहले महावीर आरोग्य संस्थान की नींव डाली गई। यहां पर गरीबों के इलाज के लिए बेहतर काम किया जाना लगा।

आचार्य के अनुसार डॉक्टरों के प्रयास और लोगों के विश्वास ने हमें और मजबूत बनाया। इसके बाद फुलवारीशरीफ में 12 दिसंबर 1998 को महावीर कैंसर संस्थान की स्थापना हुई। इसका उद्घाटन बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा ने किया। गरीब और असहाय लोगों के इलाज का खर्च महावीर मंदिर करने लगा।

कैंसर पीडि़त मरीजों के लिए बना संजीवनी

एक तरह से कहा जाए तो हनुमान मंदिर में चढऩे वाला नैवेद्यम् कैंसर जैसे असाध्य रोग से पीडि़त मरीजों के लिए संजीवनी बूटी बनकर उभरा। कैंसर संस्थान में मरीजों का कम कीमत में इलाज तो होता ही है, तीन वक्त का भोजन भी निश्शुल्क मिलता है। यहां 100 रुपये प्रति यूनिट पर रक्त उपलब्ध कराया जाता है।

18 साल तक के लोगों के इलाज का पूरा खर्च न्यास की ओर से मिलता है। मरणासन्न हालत वाले मरीजों के लिए मुमुक्षु भवन का निर्माण करने की योजना है। कुणाल बताते हैं कि मंदिर की राशि से बच्चों के इलाज के लिए महावीर वात्सल्य हॉस्पिटल बनाया गया है।

12 करोड़ रुपये सालाना आय

हनुमान मंदिर की सालाना आय लगभग 12 करोड़ रुपये है। इसे मंदिर के जीर्णोद्धार और विभिन्न अस्पतालों पर खर्च किया जाता है। आचार्य कुणाल बताते हैं कि पैसे दरिद्र नारायण भोजन, 18 वर्ष तक के कैंसर मरीजों के इलाज और देखभाल के लिए 15 हजार रुपये दिए जाते हैं। आने वाले दिनों में चंपारण जिले में भव्य विराट रामायण मंदिर बनाने की योजना है। इसके लिए मंदिर प्रबंधन की ओर से प्रयास किया जा रहा है। साथ ही मंदिर के पैसे से पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार किया जा रहा है।

यह उत्तर भारत की सबसे बड़ी धार्मिक न्यास समिति है जो धार्मिक कार्यों के साथ ठोस रूप से परोपकार का काम करती है। मंदिर में चढऩे वाले चढ़ावे का पूरा लेखा-जोखा रखा जाता है। साथ ही मंदिर से कमाई का पूरा पैसा परोपकार के कार्यों में लग जाता है। हनुमान को चढऩे वाला नैवेद्यम् प्रसाद एवं चढ़ावा आमदनी का मुख्य स्रोत हैं। देखा जाए तो नैवेद्यम् प्रसाद से मरीजों का इलाज हो रहा है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here